Tuesday, December 8, 2009

जिंदगी की कहानी


मैं एक कदम चलता और एक पल को रुकता मगर .........
इस एक पल मैं जिंदगी मुझसे चार कदम आगे निकल जाती।
मैं फिर एक कदम चलता और एक पल को रुकता और.........
जिंदगी फिर मुझसे चार कदम आगे निकल जाती।
यूँ ही जिंदगी को जीतता देख मैं मुस्कुराता और ...............
जिंदगी मेरी मुस्कराहट पे हैरान होती।
ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा ..........
फिर एक दिन मुझे हँसता देख एक सितारे ने मुझसे पुछा...
´ तुम हार कर भी मुस्कुराते हो! क्या तुम्हे दुःख नही होता हार का ?´
तब मैंने कहा ................
मुझे पता है कि एक ऐसी सरहद आएगी जहाँ से आगे
जिंदगी एक कदम भी आगे न बढ़ पाएगी
तब जिंदगी मेरा इंतजार करेगी और मैं........
तब भी मैं यूँ ही चलता रुकता अपनी रफ़्तार से अपनी धुन में वहां पहुंचूगा।
एक पल रुक कर जिंदगी को देख मुस्कुराऊंगा
बीते सफर को एक नज़र देख अपने कदम फिर बढाऊंगा
ठीक उसी पल मैं जिंदगी से जीत जाऊंगा
मैं अपनी हार पर भी मुस्कुराता था और जीत पर भी
मगर जिंदगी न अपनी जीत पर मुस्कुरा पाई थी और न हार पर रो पायेगी।

1 comment:

  1. Neel Kamal ji,
    Bahut achchhaa likha hai apane ...ummeed hai aise hee age bhee likhate rahenge. lekin mitr doosaron kebhee blog padhiye---comment deejiye .Tabhee to apke blog par traifik badhega.shubhakamnayen.
    HemantKumar

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